बाबूलाल मरांडी ने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। बाबूलाल ने पूर्व मुख्यमंत्रियों से सुविधाएं वापस लेने को आदिवासी विरोधी कदम बताते हुए कहा है कि वो कांग्रेस की गुलामी नहीं करेंगे। दिल्ली की परिक्रमा करने से बेहतर है कि वो गांव में जाकर काम करें। कांग्रेस पर्दे के पीछे से झारखंड का शासन चला रही है। पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुविधाएं वापस लेनी ही थीं तो एक लोकप्रिय सरकार लेती, ना कि राज्यपाल।
बाबूलाल मरांडी की बातों से एक बात तो एकदम साफ है कि झारखंड में अपनी दीर्घकालीन रणनीति में कांग्रेस ने बाबूलाल मरांडी को शामिल नहीं किया है। इसके साथ ये भी जाहिर हो गया है कि कांग्रेस-जेवीएम गठबंधन सिर्फ एक चुनावी समझौता था। चुनाव के बाद गठबंधन के तरफ से सरकार बनाने की पहल ना होने का स्पष्टीकरण भी इसमें छिपा हुआ है। कांग्रेस झारखंड के मामले को निलंबित रखकर कांग्रेस बिहार पर ध्यान दे रही है। बिहार के चुनावों के बाद कांग्रेस झारखंड में भी 'एकला चलो रे' की नीति अपना सकती है। ऐसे में चुप बैठकर हो सकता है कि बाबूलाल मरांडी ना घर के रहते ना घाट के।
बाबूलाल मरांडी ने सोनिया गांधी पर भी सीधा हमला कर दिया है। कहा है पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुविधा वापस लेने वाली कांग्रेस बताए कि उसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी, राजीव गांधी की मृत्यु के बाद सारी सुविधाएं क्यों लेती रही। सोनिया का नाम शामिल करके बाबूलाल ने कांग्रेस के बिचौलियों को निपटा दिया है। अब अगर कांग्रेस के साथ बाबूलाल मरांडी का कोई संबंध बनेगा तो सीधा सोनिया के दखल से बनेगा। गठबंधन का विकल्प बाबूलाल मरांडी ने अपनी तरफ से खुला रखा है। कांग्रेस के खिलाफ बगावत में जोखिम है तो इसका पुरस्कार भी बड़ा हो सकता है। इतिहास साक्षी है राजनीति में गठबंधन भी वही सफल होते हैं जिनमें सहयोगी ताकत के बल पर टिके होते हैं, ना कि बिचौलियों और पावर ब्रोकरों की मर्जी पर।
बाबूलाल मरांडी झारखंड की सियासत में इतनी जगह बना चुके हैं कि चुनाव के वक्त एक अच्छा गठबंधन खड़ा कर सकें। झारखंड में फिलहाल एक ऐसे राजनीतिक मोर्चे की ज़रूरत है जो आगे बढ़कर कमान हाथ में ले सके। बाबूलाल मरांडी इसके अगुवा बनना चाहते हैं, वो सत्ता तक पहुंचने तक विपक्ष की भूमिका में डटे रहना चाहते हैं। उन्हें इस बात का एहसास भी है कि राष्ट्रपति शासन के मौजूदा दौर में जो राजनीतिक मोर्चा लोगों के जेहन में जगह बना पाएगा, चुनाव में लोग उसको याद रखेंगे। ऐसे में राष्ट्रपति शासन के विरोध से अच्छा विकल्प कोई दूसरा नहीं है।
रही बात आदिवासी कार्ड की,तो इसके गहरे संकेत हो सकते हैं। ये तो बाबूलाल मरांडी भी जानते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुविधा को आदिवासी हितों से जोड़ना लोगों को हास्यास्पद लग सकता है। दरअसल लगभग एक तिहाई आदिवासी आबादी वाले राज्य में चुनाव जीतने के लिए ये सबसे बड़ा हथियार है। बाबूलाल मरांडी के रथ में एक यही पहिया कम है। झारखंड के आदिवासी इसाई और गैर इसाई खेमों में बंटे हैं। एक पर कांग्रेस की नजर है तो दूसरे पर बीजेपी की दावेदारी है, और शिबू सोरेन दोनों हिस्सों में दखल रखने के चलते आदिवासियों के सबसे बड़े मनसबदार हैं। बाबूलाल मरांडी ने संघ का साथ छोड़ा तो गैर इसाई आदिवासी हाथ से गए और इसाई आदिवासी आज भी उनसे सशंकित हैं। स्टीफन मरांडी जैसे लोग टिकते तो शायद स्थिति बेहतर होती। फिलहाल शिबू सोरेन के गिरते स्वास्थ्य और गिरती साख की वजह से आदिवासी मतों में गुंजाइश बनी है। कांग्रेस इसपर कब्जा करने की जुगत लगा रही है। बाबूलाल ने कांग्रेस को रोककर अपने लिए जगह नहीं बनाई तो दोबारा मुख्यमंत्री बनने का सपना देखते रह जाएंगे।
बाबूलाल मरांडी ने कांग्रेस के रोग से अपना इलाज करने की रणनीति अपनाई है। रामदयाल मुंडा को पद्मश्री और राज्यसभा में जगह देकर कांग्रेस क्या संदेश देना चाहती है , ये सभी जानते हैं। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ से सुबोधकांत सहाय मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। कांग्रेस की इस दुविधा को बाबूलाल मरांडी भली प्रकार से समझते हैं औऱ अब वो इसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहे हैं। पिछले चुनावों के दौरान बाबूलाल और सुबोधकांत के बीच इसको लेकर समझौते की बात भी सामने आई थी। फार्मूला ये था - कांग्रेस का मुख्यमंत्री बनेगा तो बाबूलाल मरांडी सुबोधकांत का समर्थन करेंगे और अगर आदिवासी के नाम पर अड़ंगा लगा तो सुबोधकांत बाबूलाल मरांडी का नाम आगे कर देंगे। खैर सरकार बनाने की नौबत ही नहीं आई। लेकिन गठबंधन का बड़ा पार्टनर होने के नाते मुख्यमंत्री चुनने का पहला अधिकार कांग्रेस को ही था। ऐसे हालात में क्या गारंटी है कि कांग्रेस ऐन वक्त पर एक आदिवासी चेहरा आगे नहीं करेगी। साफ है कि बाबूलाल को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना है तो उन्हें गठबंधन का बड़ा पार्टनर बनकर उभरना होगा। आदिवासी कार्ड के एक तीर से दो शिकार हो सकते हैं। कांग्रेस कमजोर होगी और बाबूलाल मजबूत, बशर्ते कि तीर निशाने पर लगे।

क्या ऐसा कोई नियम नहीं बन सकता है की.. vipach भी अपना एक कैबिनेट बनाये और उसमें वो सत्ता के मंत्रियों की तरह ही अपने पार्टी से भी सभी विभाग के लिए मंत्री नियुक्त करे और यदि कोई सत्ता में बैठे मंत्री जब गलत नीति बनाये या गलत काम करे तो उससे जुड़ा vipach का मंत्री... उसका विरोध सड़क पर उतर कर न करके उससे अच्छा नीति बना कर दिखाए.. या सत्ता में बैठे लोगों को रास्ताबताये.. इससे वो vipach में बैठ कर भी जनता के दिलों पर भी राज कर पायेगा..
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